जिसे आज तक ना समझ सका कोई,
वो गीत हूं मैं
साबरी है मेरी पहचान लिखने का‚
मीत हूं मैं
देखकर दूसरों के हाले दिल और गम,
उनकी धुनों पर तर्ज निकालने वाला‚संगीत हूं मैं
कम से कम सुनाये तो सही कोई अपना दर्द मुझे,
दूर तो नही मगर बांट सकता हूं‚ वो नाचीज, हूं मैं।
अपना भले ही ना करे कोई याद मुझे‚
मगर अपने दुश्मनों को बहुत अजीज, हूं मैं।
Monday, June 4, 2007
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